कल्पना की कल्पना (प्रथम खंड)


कल बहुत सालों बाद एक गोरखपुर के मित्र से मुलाकात हुई। हमने साथ-साथ सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, गोरखपुर में 11th और 12th की शिक्षा प्राप्त की थी। कुछ सामान्य अभिवादन और हाल चाल के बाद भाईसाहब ने पूछा कि साकेत बता भाभी  कैसी है ? मैंने सपाट शब्दों में रटा रटाया वाक्य दुहराया  कि भाई कोई नहीं है अभी जिंदगी में मेरी और जब होगी पक्का सबसे पहले तुझे ही बताऊंगा। और क्या ही कहता मैं? वैसे बहुत दिनों बाद किसी ने ऐसा प्रश्न पूछा था मुझसे। इंजीनिरिंग के समय अक्सर मित्रगण पूछ लिया करते थे मजाक में इस आशा में की कोई तो जीवनसंगिनी (यानि कि उनके लिए भाभी ) साकेत ने ढूंढ ही ली होगी। खैर अफ़सोस उनके बहुत सारे टिप्स और एवरेस्ट के जैसे तानों के बाद भी मेरा कुछ नहीं हो सका। अब तो मेरे इंजीनियरिंग वाले दोस्त भी 'भाभी कैसी है ' से ऊपर उठ कर सीधा 'शादी कब कर रहा है' पूछते हैं। ऊपर से एक दो मिर्ची और मल जाते हैं कान पे कि कब तक पढता रहेगा,बुड्ढा हो रहा है। खैर वापस आते हैं गोरखपुर वाले मित्र की कहानी पे। भाईसाहब ने कहा कि अरे कैसी बातें कर रहा है, थी तो तेरी एक स्कूल में, तूने हमें कहानी भी सुनाई थी तुम दोनों की। बड़ी विकट और असमंजस की स्थिति थी, मेरी प्रेम कहानी जो मैंने भाईसाहब को सुनाई थी वो मुझे ही नहीं याद आ रही थी। अभी मैं सोच ही रहा था कि क्या उत्तर बनाऊं इतने में मेरे मित्र ने ही सारे उलझनों का अंत कर दिया। उन्होंने जांबवंत देव की तरह जगह, परिस्थिति और कहानी के थोड़े-थोड़े अंश बताये और मुझे हनुमान जी की तरह सब कुछ याद आता चला गया। दरअसल एक दिन हम कई सारे दोस्त 11th के परीक्षा परिणाम सुनने के बाद घूमने के उद्देश्य से गोरखनाथ मंदिर पहुँच गए। वहां मंदिर प्रांगण में एक बहुत ही विशाल और मनभावन जलाशय है, वहीं उस जलाशय के किनारे हम सब बैठ गए। और फिर कुछ ऐसा हुआ था कि सब अपनी-अपनी कहानी  सुनाने लगे थे। मैं क्या ही सुनाता, सुनाने के लिए कुछ होना भी तो चाहिए था। और तो और सबने अपनी कुछ न कुछ कहानी बताई थी इसलिए अब मुझपे एक दबाव सा आ गया था अपनी कहानी सुनाने का। चूँकि मैं एक बहुत ही छोटे कस्बे से गया था गोरखपुर पढ़ने तो उस समय मुझे थोड़ी INFERIORITY COMPLEX भी होने लग गई कि यार मेरी तो कोई कहानी ही नहीं है। और फिर मैंने महीनों -महीनों पढ़े हुए सुमन सौरभ की कहानियों के अनुभव को समेटा और तैयार करी अपनी एक प्रेम कथा। ये बात जब मैंने मित्र को अभी हाल की मुलाकात में बताई तो वो सहसा विश्वास नहीं कर पा रहा था कि जो भी मैंने सुनाई थी वो सारी कल्पना थी। एक ऐसी कहानी जो कपोल कल्पना को कुछ सच्चे तथ्य के आवरण में लपेट के प्रस्तुत की गई थी और वो सत्य होने का आभाष कराने में सफल हुई थी। और इतनी सफल थी की ११ वर्षों के बाद भी मित्र ने उसे अपनी यादों में संभल रखा था। हालाँकि मुझे इस बात की बहुत ग्लानि हुई, उस समय लेकिन मैं मजबूर था। मैं बताता हूँ वो कहानी और पूर्वाग्रह को दूर रख के पढियेगा, देखते हैं आपको कहानी में कितनी सच्चाई लगती है। वैसे मेरी कहानी की हिरोइन का नाम था कल्पना 

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