शोकाकुल प्रेम
कभी कभी ऐसी परिस्थिति बन जाती है जिसमें निर्णय लेना अत्यंत ही दुष्कर होता है। और बात जब जिंदगी में प्रेम और उससे जुड़े भावनात्मक पक्षपातपूर्ण मामलों का हो तो फिर सर्वत्र अन्धकार ही व्याप्त होता प्रतीत होता है। यहाँ प्रेम से पल्लवित भावनाओं को पक्षपातपूर्ण कहना शायद अतिशयोक्ति हो सकती है लेकिन प्रायः प्यार में अंधे बने हुए लोग मिल ही जाते हैं। सभी ने अपने अपने पैमाने बना रखे हैं सच्चाई और विश्वसनीयता को परखने के और सभी को अपने पैमाने पे रत्ती भर का भी संदेह नहीं होता। कुछ प्यार को साथ बिताये हुए पलों के साथ जोड़कर तौलते हैं तो कुछ आपस में एक दूसरे के लिए सम्मान और समझ को असली मानक बताते हैं। वैसे पैसे को अधिकतर इस नाप जोख के मानक से बाहर ही रखा जाता है परन्तु इसका योगदान किसी भी तरीके से अनदेखा करने लायक नहीं है। हालाँकि सत्य है कि जिस चीज का स्वयं अनुभव ना हो उसके बारे में टिपण्णी करना उच्श्रृंखलता या मात्र बचकानी हरकत के अलावा कुछ नहीं। परन्तु भले ही मैं कभी किसी के साथ स्वयं को जोड़ नहीं पाया लेकिन सामाजिक परिवेश में हो रहे सामान्य व्यावहारिक क्रियाकलापों का अवलोकन भलीभांति किया है। अभी यहाँ इन सारी बातों की विवेचना इसलिए कर रहा हूँ क्यूंकि हाल ही में एक मित्र प्रेम प्रसंग में धोखा खाकर दुःख से शोक-ग्रसित है। हम सब सारे दोस्त मिलकर भी उसे उसके शोकाकुल प्रेम से बाहर खींच पाने में असमर्थ हैं। मैं समझता हूँ कि किसी के साथ वर्षों पुराने संबंध को एक झटके में तोड़ना लगभग लगभग मुश्किल है और उसके लिए विद्यमान भावनाओं को शून्य करना तो शायद समयातीत ही प्रतीत हो। पर क्या ये तर्कसंगत होगा कि किसी ऐसे के लिए अपनी जिंदगी को अवसाद का घर बना लिया जाये जिसे बिल्कुल फर्क ही नहीं पड़ता इससे? जहाँ तक मेरी समझ है वो ये कहती है कि अगर शरीर के किसी अंग में घाव हो जाये और उसका जहर पूरे शरीर में फैले, इससे बेहतर है कि उस अंग को ही काट के निकाल फेंक दिया जाए। लेकिन इसमें भी भयंकर लोचा है वो सबसे पहले तो यही मानने को तैयार नहीं कि लड़की की कोई गलती है। और जब तक वो इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेगा तब तक वो घाव बना दर्द देता रहेगा और उसका इलाज भी नहीं किया जा सकेगा। लेकिन इसमें उसकी भी कोई गलती नहीं। 6 वर्षों का साथ कोई 2 दिनों में छोड़कर चला जाये तो सहसा ही कोई इसे पचा पायेगा। पूरा वाकया तो मैं यहाँ बता नहीं सकता लेकिन इस घटना ने मुझे सोचने पे मजबूर कर दिया और रिश्तों एवं संबंधों के अपने परिभाषाओं और मनोविज्ञान को झकझोर कर रख दिया। अंत में भगवान से प्रार्थना के साथ बात ख़त्म करता हूँ कि ऐसी स्थिति किसी की न हो कभी और मेरा मित्र सारे अवसादों से उबर कर अपने जिंदगी के बड़े और वास्तविक लक्ष्यों की ओर अग्रसर हो।
शुभ रात्रि।
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