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भाषा और रीडिंग स्पीड

वैसे तो आजकल कुछ पढ़ने के लिए समय निकालना बहुत ही मुश्किल जान पड़ता है  और तब तो और मुश्किल हो जाती है जब आपके पास NETFLIX और AMAZON PRIME  जैसे सेवा प्रदाता उपलब्ध हों। आखिर GAME OF THRONES को कौन पढ़ने की सोचता है जबकि उसके पास उसे देखने का विकल्प हो। पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें सनक रहती है पढ़ने की और जब पूरी दुनिया SACRED GAMES  देखने में व्यस्त रहती है तब वो अकेले उसे अपने KINDLE  में पढ़ते हुए पाए जाते हैं। 😅 ना ना, मैं  नहीं शामिल हूँ ऐसी महान आत्माओं के वर्ग में। मुझे तो बहुत पसंद है ये SHOWS। परन्तु किसी लेखक की कहानी पढ़ने में और उसे देखने में बहुत अंतर है। पढ़ते समय आप स्वतंत्र होते हैं अपने प्रिय चरित्रों की सजीव कल्पना के लिए  जबकि उस कहानी के आधार पे बने धारावाहिक में ऐसी स्वतंत्रता की अपेक्षा करना  बचकाना हीं है। आर. आर. मार्टिन ने लिखा है, " A reader lives a thoousand lives before he dies. The man who never reads lives only one. "  तो फिर मार्टिन साहब के बातों में आकर मैंने एक और जिंदगी जीने की आशा में  SACRED GAMES पढ़ा (?...

शोकाकुल प्रेम

कभी कभी ऐसी परिस्थिति बन जाती है जिसमें निर्णय लेना अत्यंत ही दुष्कर होता है। और बात जब जिंदगी में प्रेम और उससे जुड़े भावनात्मक पक्षपातपूर्ण मामलों का हो तो फिर सर्वत्र अन्धकार ही व्याप्त होता प्रतीत होता है। यहाँ प्रेम से पल्लवित भावनाओं को पक्षपातपूर्ण कहना शायद अतिशयोक्ति हो सकती है लेकिन प्रायः प्यार में अंधे बने हुए लोग मिल ही जाते हैं। सभी ने अपने अपने पैमाने बना रखे हैं सच्चाई और विश्वसनीयता को परखने के और सभी को अपने पैमाने पे रत्ती भर का भी संदेह नहीं होता। कुछ प्यार को साथ बिताये हुए पलों के साथ जोड़कर तौलते हैं तो कुछ आपस में एक दूसरे के लिए सम्मान और समझ को असली मानक बताते हैं। वैसे पैसे को अधिकतर इस नाप जोख के मानक से बाहर ही रखा जाता है परन्तु इसका योगदान किसी भी तरीके से अनदेखा करने लायक नहीं है।  हालाँकि सत्य है कि जिस चीज का स्वयं अनुभव ना हो उसके बारे में टिपण्णी करना उच्श्रृंखलता या मात्र बचकानी हरकत के अलावा कुछ नहीं। परन्तु भले ही मैं कभी किसी के साथ स्वयं को जोड़ नहीं पाया लेकिन सामाजिक परिवेश में हो रहे सामान्य व्यावहारिक क्रियाकलापों का अवलोकन भलीभांति किया...

कल्पना की कल्पना (द्वितीय खंड)

राफेल और सवर्ण आरक्षण के शोर के मध्य भी कल्पना की कल्पना का प्रथम खंड इतना पढ़ा और सराहा जायेगा, ये कल्पना कभी मन में आई ही नहीं पाई थी। तो जिसकी कल्पना ही न हो मन में और वो घटित हो जाये फिर  शब्द जुड़ हीं नहीं पाते वाक्य-निर्माण के हेतु। ऊपर से बहुत सारे मित्रों के प्रशंसा के शब्दों ने मन में उनके अपेक्षाओं पे खरा ना उतर पाने का भय भी अंकुरित कर दिया है। अब तो असमंजस है कि मित्रों को उनके प्रशंसात्मक शब्दों के लिए धन्यवाद दूँ या दोषारोपण करूँ उस भय के लिए (😅😅😈)। खैर इन उदार वचनों  के मध्य एक मित्र ने कहा, "कुछ कहानियाँ हम किसी को सुना नहीं सकते और कथाकार ऐसी कहानियों को काल्पनिक कथा के आवरण में प्रस्तुत कर देते हैं और साकेत शायद तू भी इस कहानी के सहारे उन सच्ची कहानियों को  दुबारा जीने की कोशिश कर रहा है।" इतनी गंभीर बात पे क्या ही कहता मैं ? बस इतना कह पाया कि अगले भाग को पढ़ फिर उसके बाद अपने विचार देना। तो आते हैं असली कहानी पे।                   गोरखनाथ मंदिर में तालाब के किनारे सभी दोस्तों की कहानियां मुख्यतः ३ ...

कल्पना की कल्पना (प्रथम खंड)

कल बहुत सालों बाद एक गोरखपुर के मित्र से मुलाकात हुई। हमने साथ-साथ सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, गोरखपुर में 11th और 12th की शिक्षा प्राप्त की थी। कुछ सामान्य अभिवादन और हाल चाल के बाद भाईसाहब ने पूछा कि साकेत बता भाभी  कैसी है ? मैंने सपाट शब्दों में रटा रटाया वाक्य दुहराया  कि भाई कोई नहीं है अभी जिंदगी में मेरी और जब होगी पक्का सबसे पहले तुझे ही बताऊंगा। और क्या ही कहता मैं? वैसे बहुत दिनों बाद किसी ने ऐसा प्रश्न पूछा था मुझसे। इंजीनिरिंग के समय अक्सर मित्रगण पूछ लिया करते थे मजाक में इस आशा में की कोई तो जीवनसंगिनी (यानि कि उनके लिए भाभी  ) साकेत ने ढूंढ ही ली होगी। खैर अफ़सोस उनके बहुत सारे टिप्स और एवरेस्ट के जैसे तानों के बाद भी मेरा कुछ नहीं हो सका। अब तो मेरे इंजीनियरिंग वाले दोस्त भी ' भाभी कैसी है ' से ऊपर उठ कर सीधा ' शादी कब कर रहा है' पूछते हैं। ऊपर से एक दो मिर्ची और मल जाते हैं कान पे कि कब तक पढता रहेगा,बुड्ढा हो रहा है। खैर वापस आते हैं गोरखपुर वाले मित्र की कहानी पे। भाईसाहब ने कहा कि अरे कैसी बातें कर रहा है, थी तो तेरी एक स्कूल म...

अनोखा लेखाजोखा _2018

नमस्कार ! आज आखिरी दिन है 2018 का। वैसे ज्यादातर लोग तो आज, कल आने वाले नव वर्ष का स्वागत धूमधाम और नाचते थिरकते हुए करने की तयारी करने में व्यस्त होते हैं। मैं भी तैयारियों में हीं लगा हूँ आज, पर वो धूमधाम और थिरकने वाली नहीं बल्कि यादों की छंटनी करने में जो मुझे अपने साथ ले जाना है नए वर्ष में। बहुत सारी खट्टी मीठी  यादें हैं जो इतनी जिवंत हैं मानसपटल पे कि मन मानने को तैयार नहीं कि नव वर्ष आ गया। पर मन के मानने से क्या होता है वैसे भी मन के हिसाब से चलना और उसकी चपलता से तालमेल बिठाना दोनों ही असाध्य है। खैर हमें मन से क्या लेना देना असली मुद्दे पे आते हैं। आज सुबह से मोबाइल पे लोगों के ढेर सारे नव वर्ष  के शुभकामनाओं वाले सन्देश आ रहे हैं। कुछ लोग धन्यवाद वाला सन्देश भेज कर अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहे हैं कि मैं इस वर्ष  उनकी जिंदगी में  छोटी सी कड़ी बन कर जुड़ा रहा। मैंने भी कोशिश की आभार व्यक्त करने की और शुभकामनायें देने की FORWARDED MESSAGES की वैशाखी  के सहारे, परन्तु इस प्रयास को मेरे लेखक मन ने खोखला और निरर्थक साबित कर दिया। और अब इस खोखलेपन को भरन...

अरेराज की छठ पूजा और बचपन

छठ महापर्व एक उल्लास उमंग का पर्व है जिसपे सारे घर के सदस्य और मित्रगण का समागम होता है। मैं भी इस वर्ष छठ पर्व के हेतु घर पे ही था। इस बार घर पे कोसी भरा जाना था तो थोड़ी भाग दौड़ अधिक थी। कोसी भरना छठ पर्व के दौरान किया जाने वाला एक विशेष उपासना पद्धति है जिसमे गन्नों के गट्ठर को उसके निचले भाग से फैलाकर खड़ा करके उसके चारो तरफ नाना प्रकार के फलों और मिठाइयों से सजे हुए बड़े मृतिका पात्र में दीप प्रज्वलित कर छठ मईया का आह्वान किया जाता है। साँझ पहर के छठ घाट पे दौरा  (बाँस या पीतल का बना हुआ पात्र) ले जाकर घाट पे रखने के बाद कुछ और करने को रहता नहीं है। छठव्रती माताएं और बाकी  के परिवारजन सब अस्तगामी सूर्य देव की पूजा करते है और उनके पूर्णतया अस्त हो जाने का इंतज़ार रहता है। इस बार की छठ पूजा में सँझिया घाट के समय दौरा   ले जाकर रखने के पश्चात् जो भगवान सूर्य के अस्त होने तक की प्रतीक्षा का समय था बड़ा हीं उबाऊं सा था। एक बड़ी हास्यास्पद सी स्थिति थी मेरे साथ। जिस छठ पर्व का उद्देश्य ही बंधु-बांधवों और परिचितों का समागम होता है, उस पर्व में मैं अकेला पड़ गया था। प्रतीक अ...

An Evening with Her

She was standing with her luggage, looking for me, near the main gate of Chandragupta Prabandha Sansthan. The moment when I saw her after 1 hr long waiting at bus stop, was just breathtaking. She was looking stunningly beautiful. And I got very very nervous. I had thought many options for my first reactions like, to saying Hi with a funny comment or shaking hands together or a tight warm hug. But all I could manage to say a feeble Hi and to ask about her wellbeing. I literally prayed to Bhole Baba but before he could do any miracle, her teeny tiny bindi on the forehead and redder lips caught me unguarded. My situation was similar to Ta’challa when he saw Nakia after a long time in Marvel’s Black Panther movie. Well, I too was about to freeze. Somehow, I managed to hold my mind straight and told her about the dinner plan and booked OLA cab with the little sense I could manage to recover. And then just when my senses were returning, she smiled and coerced them go away, too far to cat...